10 फरवरी, 1846 को साब्रओ की लड़ाई में सिख अंग्रेज से पराजित हुए |
1814 ई. में अंग्रेज और गोरखों के बीच युद्ध के पश्चात जैसा उद्दारपूर्ण वयवहार अंग्रेजों ने उन पहाड़ी राज्यों के साथ किया था, वैसा ही व्यवहार पंजाब के पहाड़ी राज्यों के राजा भी कर रहे थे |

19 मार्च, 1846 ई. को सिखों और अंग्रेजों के बीच लाहौर सन्धि हुई, जिसकी शर्तों के अनुसार सिखों के बीच स्थित जालन्धर – दोआब का विस्तृत क्षेत्र भी शामिल था , अंग्रेजों को प्राप्त हो गया |

सिखों द्वारा डेढ़ करोड़ रुपयों का युद्ध का खर्चा अंग्रेजो को दिया गया, जिसमे पचास लाख रूपये नकद दिए गए और शेष एक करोड़ के बदले सिंध और व्यास के बीच के पहाड़ी प्रदेश, जिसमे कश्मीर और हज़ार भी शामिल थे , दे दिए गए |
अंग्रेजों ने पहाड़ी राज्य उनके राजाओं को वापस करने की अपेक्षा सतलुज और रावी के बीच के क्षेत्र अपने अधीन रखे और शेष राज्य को महाराजा गुलाब सिंह को बेच दिया | जिसके परिणामस्वरूप काँगड़ा, गुलेर, जसवां, दातापुर के अधीन हो गए |

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