हिमाचल प्रदेश का इतिहास, राज्यों का प्रादुर्भाव

हिमाचल प्रदेश के प्राचीन राज्यों में काँगड़ा, कुल्लू , रामपुर-बुशहर और लाहौल-स्पीति के नाम प्रमुख है । इनमे से किसी राज्य में राजा, किसी में राणा, कहीं ठाकुर व कहीं मावी राज्य करते थे ।
चम्बा राज्य की नीव ५५० ई. के करीब सूर्यवंशी राजा मेरुवर्मन ने राखी और ब्रह्मपुर (भरमौर) को अपनी राजधानी बनाया ।
६९७ ई. में राजा वीरभचंद ने , जो स्वयं को चंद्रवंशी मानते थे, कहलूर राज्य की स्थापना की । उस समाय वह क्षेत्र साढ़ा, बाढा मलाढा और झंडा चार ठाकुरो में विभक्त था । उन्हें पराजित कर वीरचंद ने कहलूर राज्य की स्थापना की ।
पांगणा नामक स्थान पर ७६५ ई. एक और राज्य की नीव राखी गयी, जो बाद में सुकेत के नाम से जाना गया। इसकी राजधानी भी पांगणा से सुंदरनगर स्थानांतरित कर दी गयी ।
बड़े राज्यों की स्थापना से पहले सारा क्षेत्र अनेक छोटे सामंतो के अधीन बटा हुआ था । ये लोग राणा या ठाकुर की उपाधि धारण करते थे ।
बड़े शासको की अधीनता स्वीकार करने के बाद भी ये लोग अपनी स्वतंत्रता के लिए प्रयास करते रहे और जब भी अवसर मिलता स्वतंत्र हो जाते थे | इस प्रकार इस पर्वतीय क्षेत्र में छोटे छोटे और बड़े शासको ने लगातार संघर्ष रहा ।
राज्यों की सीमाएं बनती और बिगड़ती रही वहा के शासक स्वयं तो लड़ते थे साथ में जनता को भी उनके साथ लड़ना पड़ता था । इस कारण विकास कार्यो की ओर कोई ध्यान नहीं दिया गया ।
हिमाचल प्रदेश के क्षेत्र में रहने वाली अनार्य जातियों का सबसे शक्तिशाली राजा शाम्बरथा ।इसी की भांति चुमुरि, घामी, शशुन और अश्रुरा आदि अन्य राजा भी उस समय विध्यमान थे ।
अनार्य राजा शाम्बर के आर्य राजा दिवोदास से कई युद्ध हुए।अंतिम युद्ध में शाम्बर की हत्या कर दी गयी ।राजा दिवोदास के पुत्र राजा सुदास ने दस अन्य आर्य राजाओं को साथ मिला कर अनार्य राजाओ को पराजित किया ।

सुदास वैदिक काल का सबसे प्रसिद्ध राजा था | इन युधो के कारण अनार्य लोग ऊपरी पहाड़ो की ओर चले गए | आर्य लोगो ने उनका पीछा नहीं किया और स्वयं उपजाऊ भूमि में बस गए |
महाभारत काल में त्रिगर्त का राजा सुशर्मचंद्र था, जिसने महाभारत काल में कौरवो की सहायता की थी |
प्रदेश के बड़े जनपद राज्यों में त्रिगर्त, औंदुबर, कुलूत, युगांधर, गब्दिका और कलिंद या कुलिंद मने जाते थे |
त्रिगर्त संघ व्यास और सतलुज की मैदानी घाटियों और जालंधर क्षेत्र तक फैला हुआ था | यह नम्म जाती का सूचक न हो कर क्षेत्र विशेष के लिए बोला जाता है | बाद में मैदानी क्षेत्र अलग हो गया | इसमें मुख्य पहाड़ी क्षेत्र काँगड़ा ही रह गया |

कुलिंद (कोलिंद) जनपद वर्तमान शिमला, किन्नौर, सोलन, और सिरमौर क्षेत्र में फैला है | कई इतिहासकार कनैतो को कुलिंदो का वंशज मानते है | वह व्यास, सतलुज और यमुना के पहाड़ी क्षेत्र में रहते थे|

युगधर जनपद कहलूर (बिलासपुर) और नालागढ़ क्षेत्र में फैला था | इसका सम्बन्ध ऋषि विश्वामित्र से जोड़ा जाता है | गब्दिका जनपद चम्बा तक सिमित था |
छठी और सातवीं शताब्दी में कुलूत, त्रिगर्त, सिरमौर, लाहौल-स्पीति, चम्बा आदि जनपदो की शक्ति और बढ़ चुकी थी |
दसवीं शताब्दी तक चम्बा, कुल्लू, काँगड़ा, रामपुर-बुशहर, बिलासपुर, मंडी, सुकेत, सिरमौर, नालागढ़, कहलूर, क्योंथल, जुब्बल, कोटखाई-कोटगढ़, कुमारसेन बघाट जैसे अनेक छोटे-छोटे राज्यों की स्थापना हो चुकी थी |

मवाना और मावी ठाकुर भी छोटे छोटे क्षेत्रो के स्वामी बन गए थे | ये आपस में लड़ते रहते थे | इसी कारण से उनके सम्बन्धो को बोइर प्रथा के नाम से आज भी जाना जाता है | आपसी फुट के कारण बाहरी आक्रमणकारी इन राज्यों को लूटते रहते थे |
बड़े और पुराने राज्यों में कुलूत, काँगड़ा, रामपुर-बुशहर, लाहौल-स्पीति तो पहले से विध्यमान थे | हिमाचल के शेष राज्यों में चम्बा की स्थापना 550 ई. में हुई | कहलूर (बिलासपुर) की स्थापना 697 ई. में हुई|
मंडी और सुकेत राज्य का संस्थापक एक ही था | इसकी स्थापना 765 ई. में हुई | बाद में ये मंडी और सुकेत दो राज्यों में पृथक हो गए |
सिरमौर की स्थापना 700 ई. में हुई| कहलूर वंश के दो भाइयो के झगडे के कारण नालागढ़ अलग राज्य बना |
क्योंथल राज्य की स्थापना 18 वी. शताब्दी में हुई | 10 वी. शताब्दी तक 18 ठाकुर वंश भी अस्तित्व में आ चुके थे | इसमें प्रमुख थे – खनेटी, कोटखाई, जुब्बल, कुम्हारसेन, खैरागढ़ और रावी इत्यादि थे |

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